अगर पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक सुरंग
सोचिए, अगर पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक सीधी सुरंग बना दी जाए और कोई व्यक्ति उसमें छलांग लगा दे, तो वह कितनी देर में धरती के दूसरी तरफ पहुंचेगा? यह सवाल सुनने में किसी साइंस-फिक्शन फिल्म जैसा लगता है, लेकिन भौतिक विज्ञान में इसे एक बेहद दिलचस्प काल्पनिक प्रयोग यानी Gravity Tunnel के तौर पर समझाया जाता है।
आमतौर पर इसका जवाब करीब 42 मिनट बताया जाता है। हालांकि, पृथ्वी के अंदर घनत्व समान नहीं है। वास्तविक पृथ्वी की आंतरिक संरचना को गणना में शामिल करने पर वैज्ञानिकों ने यात्रा का समय लगभग 38 मिनट 11 सेकंड पाया है।
अगर धरती के आर-पार सुरंग हो तो क्या होगा?
मान लीजिए पृथ्वी के एक बिंदु से उसके ठीक विपरीत बिंदु तक एक बिल्कुल सीधी सुरंग बनाई गई है और यह सुरंग पृथ्वी के केंद्र से होकर गुजरती है।
अब अगर कोई व्यक्ति इस सुरंग में कूदता है तो उसे नीचे की ओर खींचने वाली मुख्य ताकत गुरुत्वाकर्षण होगी। शुरुआत में पृथ्वी की सतह पर गुरुत्वाकर्षण उसे तेजी से नीचे की तरफ खींचेगा और उसकी रफ्तार लगातार बढ़ती जाएगी।
जैसे-जैसे वह पृथ्वी के केंद्र की ओर जाएगा, गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव बदलता जाएगा।
पृथ्वी के केंद्र पर क्या होगा?
इस काल्पनिक यात्रा का सबसे दिलचस्प हिस्सा पृथ्वी का केंद्र है।
पृथ्वी के बिल्कुल केंद्र पर अलग-अलग दिशाओं में मौजूद द्रव्यमान का गुरुत्वाकर्षण एक-दूसरे को संतुलित कर देता है। इसलिए उस क्षण व्यक्ति को नेट गुरुत्वाकर्षण बल शून्य महसूस होगा।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि व्यक्ति वहीं रुक जाएगा।
सुरंग में गिरते हुए उसकी गति इतनी अधिक हो चुकी होगी कि वह जड़त्व के कारण केंद्र को पार कर दूसरी तरफ आगे बढ़ता रहेगा। इसी कारण वह दूसरी सतह की ओर ऊपर जाने लगेगा।
करीब 28 हजार किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच सकती है रफ्तार
समान घनत्व वाली पृथ्वी के सरल मॉडल में केंद्र तक पहुंचते समय वस्तु की गति लगभग 7.9 किलोमीटर प्रति सेकंड, यानी करीब 28,000 किलोमीटर प्रति घंटे के आसपास हो सकती है। यह बेहद तेज गति है।
इसके बाद गुरुत्वाकर्षण व्यक्ति को दूसरी दिशा में खींचने लगेगा और उसकी गति धीरे-धीरे कम होगी।
आदर्श स्थिति में वह दूसरी तरफ की सतह तक पहुंचते-पहुंचते लगभग रुक जाएगा।
तो दूसरी तरफ पहुंचने में 42 मिनट लगेंगे या 38 मिनट?
यही इस सवाल का सबसे रोचक हिस्सा है।
पुरानी और सरल गणना में यह माना जाता था कि पृथ्वी के अंदर हर जगह घनत्व एक जैसा है। इस मॉडल के अनुसार एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचने में करीब 42 मिनट 12 सेकंड लगते हैं।
लेकिन वास्तविक पृथ्वी ऐसी नहीं है। पृथ्वी की क्रस्ट, मेंटल और कोर का घनत्व अलग-अलग है। पृथ्वी के अंदर जाते-जाते पदार्थ का घनत्व काफी बदलता है।
भौतिक विज्ञानी अलेक्जेंडर क्लोट्ज ने पृथ्वी की वास्तविक आंतरिक संरचना को ध्यान में रखकर गणना की और लगभग 38 मिनट 11 सेकंड का समय निकाला।
यानी जवाब:
सरल मॉडल: करीब 42 मिनट
वास्तविक घनत्व को ध्यान में रखकर: करीब 38 मिनट 11 सेकंड
लेकिन असल जिंदगी में ऐसा करना संभव क्यों नहीं है?
यहां सबसे जरूरी बात यह है कि यह पूरा विचार काल्पनिक भौतिकी प्रयोग है। वास्तव में पृथ्वी के आर-पार ऐसी सुरंग बनाना मौजूदा तकनीक से संभव नहीं है।
सबसे पहले तो पृथ्वी का व्यास लगभग 12,742 किलोमीटर है। इतनी लंबी सुरंग बनाने के लिए पृथ्वी की सतह के नीचे हजारों किलोमीटर चट्टानों और अत्यधिक गर्म पदार्थ को पार करना पड़ेगा।
पृथ्वी के अंदर तापमान और दबाव बेहद अधिक है। इसके अलावा
पृथ्वी का बाहरी कोर मुख्य रूप से पिघली हुई धातुओं से बना है। ऐसे वातावरण में
सामान्य सुरंग बनाना और उसे खुला रखना व्यावहारिक रूप से असंभव होगा।
हवा मौजूद हुई तो क्या होगा?
42 या 38 मिनट वाली गणना एक बेहद महत्वपूर्ण शर्त पर आधारित है—
सुरंग में हवा का प्रतिरोध नहीं माना जाता।
अगर सुरंग के अंदर हवा मौजूद हो, तो गिरते हुए व्यक्ति पर वायु प्रतिरोध लगेगा।
इससे उसकी ऊर्जा लगातार कम होगी और वह आदर्श गणना के मुताबिक दूसरी तरफ तक नहीं पहुंच पाएगा।
यही वजह है कि वैज्ञानिक इस विचार को समझाने के लिए
अक्सर एक ऐसी सुरंग की कल्पना करते हैं जिसमें हवा न हो।
क्या व्यक्ति दूसरी तरफ निकलकर अंतरिक्ष में चला जाएगा?
नहीं।
अगर बिल्कुल आदर्श परिस्थितियां हों और सुरंग के दोनों छोर समान ऊंचाई पर हों,
तो व्यक्ति दूसरी सतह तक पहुंचते-पहुंचते उसकी गति लगभग शून्य हो जाएगी।
लेकिन वह सतह से बाहर निकलने के बाद दोबारा पृथ्वी की तरफ गिरने लगेगा।
इस तरह वह सुरंग के भीतर आगे-पीछे झूलता रहेगा, बिल्कुल किसी विशाल पेंडुलम की तरह।
वायु प्रतिरोध या दूसरी ऊर्जा-हानि मौजूद होने पर हर चक्कर में
उसकी गति कम होती जाएगी और अंततः वह पृथ्वी के केंद्र के आसपास रुक जाएगा।
इंसान इतनी गहराई तक क्यों नहीं पहुंच सकता?
पृथ्वी के अंदर जाना केवल सुरंग खोदने की समस्या नहीं है।
गहराई बढ़ने के साथ तापमान, दबाव और चट्टानों की प्रकृति बड़ी चुनौती बन जाती है।
इंसानों द्वारा बनाई गई सबसे गहरी बोरिंग परियोजनाओं में रूस की
Kola Superdeep Borehole शामिल है, जिसकी गहराई करीब 12 किलोमीटर रही—
पृथ्वी के केंद्र तक की दूरी की तुलना में यह बेहद छोटा हिस्सा है।
इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पृथ्वी के
आर-पार सुरंग बनाना आज की तकनीक से कितना दूर का विचार है।
अगर यह संभव होता तो यात्रा किसी ‘ग्रेविटी ट्रेन’ जैसी होती
इस काल्पनिक प्रयोग को अक्सर Gravity Train कहा जाता है।
इसमें किसी इंजन की जरूरत नहीं होगी। पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण ही व्यक्ति को एक छोर से दूसरे छोर तक खींचेगा।
पहले व्यक्ति तेजी से केंद्र की तरफ गिरेगा, केंद्र पार करने के बाद
गुरुत्वाकर्षण उसकी गति कम करेगा और वह दूसरी सतह तक पहुंच जाएगा।
यानी एक तरह से गुरुत्वाकर्षण ही यात्रा का इंजन बन जाएगा।
निष्कर्ष
अगर पृथ्वी के आर-पार बिल्कुल सीधी सुरंग बनाना संभव हो और सुरंग में हवा का प्रतिरोध तथा व्यावहारिक बाधाएं न हों,
तो किसी व्यक्ति को दूसरी तरफ पहुंचने में लगभग 42 मिनट लग सकते हैं। पृथ्वी के वास्तविक
आंतरिक घनत्व को ध्यान में रखने वाली अधिक यथार्थवादी गणना इसे लगभग 38 मिनट 11 सेकंड बताती है।
हालांकि, वास्तविक दुनिया में पृथ्वी के आर-पार ऐसी सुरंग बनाना अत्यंत कठिन और वर्तमान
तकनीक से असंभव है। इसलिए यह सवाल वास्तविक यात्रा से ज्यादा गुरुत्वाकर्षण, गति और पृथ्वी की
आंतरिक संरचना को समझने वाला शानदार वैज्ञानिक प्रयोग है।
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